केंद्रीय विषय-वस्तु
यह शोध-पत्र २०वीं सदी के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (संजीव कृत उपन्यास ‘सूत्रधार’) तथा २१वीं सदी के समकालीन परिप्रेक्ष्य (‘पूरबी बयार’ के आंचलिक विमर्श) के माध्यम से पूर्वी भारत (बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश) के ग्रामीण समाज में आए संरचनात्मक, सांस्कृतिक और राजनैतिक बदलावों का एक गहन समाजशास्त्रीय व साहित्यिक अनुशीलन है।
मुख्य निष्कर्ष एवं वैचारिक रूपांतरण
प्रतिरोध की प्रकृति में बदलाव (मूक बनाम प्रत्यक्ष)ः ‘सूत्रधार’ में शोषितों (विशेषकर नाँह जाति) का प्रतिरोध कलात्मक, परोक्ष और प्रतीकात्मक है, जो भिखारी ठाकुर के ‘बेटी-बेचवा’ जैसे नाटकों के माध्यम से सामंतवाद के विरुद्ध केवल वैचारिक बीज बोता है। इसके विपरीत, समकालीन ‘पूरबी बयार’ में विद्रोह का आवरण टूट चुका है। डॉ. आंबेडकर के विचारों और राजनैतिक चेतना के प्रभाव से आज का वंचित नायक (पारसनाथ) चुनावी राजनीति, अदालतों और सड़कों पर अपने अधिकारों के लिए प्रत्यक्ष संघर्ष लड़ रहा है।
स्त्री-चेतना का प्रकटीकरण (अदृश्यता बनाम दृश्यता)ः ऐतिहासिक रूप से ग्रामीण अंचल की स्त्री मुख्यधारा से पूरी तरह ’अदृश्य’ थी अपितु यहाँ तक कि रंगमंच पर भी स्त्रियों का प्रवेश निषेध होने के कारण पुरुष कलाकार (लहटू व दुखी) स्त्री वेश धारण करके ’लौंडा नाच’ करते थे। स्त्री का अस्तित्व केवल पति (महेंदर) के विरह गीतों (गवणाई) तक सीमित था। आधुनिक ‘पूरबी बयार’ में यह स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज की स्त्रियाँ (लखपति) महिला स्वावलंबन समूहों के माध्यम से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होकर ग्राम पंचायतों और नागरिक समाज के निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में सक्रिय व स्वतंत्र भूमिका निभा रही हैं।
विस्थापन और प्रवासन का नया संकटः शोध यह रेखांकित करता है कि बीसवीं सदी का जो प्रवासन केवल कलकत्ता या असम की चाय झाड़ियों तक सीमित था, वह आज वैश्विक बाज़ारवाद के कारण दिल्ली, मुंबई और खाड़ी देशों तक फैल चुका है, जिसने गाँवों को “भूत-गांवों“ (घोस्ट विलेजेज़) में तब्दील कर नए पारिवारिक संकट खड़े कर दिए हैं।
अकादमिक मूल्य
अंततः, यह शोध-पत्र प्रमाणित करता है कि पूर्वी भारत का ग्रामीण समाज अब केवल एक पिछड़ा भौगोलिक अंचल नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय की एक जीवंत, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील प्रयोगशाला बन चुका है। यह अध्ययन साहित्य और समाजशास्त्र के अंतर्संबंधों को समझने के लिए एक अनिवार्य कुंजी है।
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Article DOI: 10.62823/IJEMMASSS/8.2(I).9112