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INTERNATIONAL JOURNAL OF EDUCATION, MODERN MANAGEMENT, APPLIED SCIENCE & SOCIAL SCIENCE (IJEMMASSS) [ Vol. 8 | No. 1 (II) | January - March, 2026 ]

महिला प्रतिनिधियों के सामने आने वाली सामाजिक बाधाएँः ग्रामीण संदर्भ

प्रियंका चौधरी एवं डॉ. जगमाल सिंह शेखावत (Priyanka Choudhary & Dr. Jagmal Singh Shekhawat)

यह शोध-पत्र “महिला प्रतिनिधियों के सामने आने वाली सामाजिक बाधाएँः ग्रामीण संदर्भ” विषय पर केंद्रित है। पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं को संवैधानिक आरक्षण मिलने के बाद ग्रामीण भारत में महिला नेतृत्व की उपस्थिति तो बढ़ी है, किन्तु व्यवहारिक स्तर पर उन्हें अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह अ/ययन विशेष रूप से उन बाधाओं का विश्लेषण करता है जो महिला प्रतिनिधियों की प्रभावी भागीदारी को सीमित करती हैं। ग्रामीण समाज की पितृसत्तात्मक संरचना, घूँघट प्रथा, ‘प्रधान-पति’ संस्कृति, घरेलू कार्यों का अत्यधिक बोझ, सार्वजनिक मंचों पर बोलने में झिझक तथा शिक्षा और जानकारी का अभावकृये सभी कारक महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को प्रभावित करते हैं। कई स्थानों पर महिला प्रतिनिधि केवल औपचारिक चेहरा बनकर रह जाती हैं, जबकि वास्तविक निर्णय उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य लेते हैं। लोक प्रशासन के दृष्टिकोण से यह भी पाया गया कि प्रशासनिक अधिकारियों तथा पुरुष प्रतिनिधियों का व्यवहार कई बार महिला नेतृत्व को गंभीरता से नहीं लेता। परिणामस्वरूप, महिला प्रतिनिधियों का आत्मविश्वास प्रभावित होता है और वे निर्णय-प्रक्रिया में स्वतंत्र भूमिका निभाने से हिचकती हैं। शोध-पत्र में एक काल्पनिक किन्तु यथार्थपरक केस स्टडी के मा/यम से यह दिखाया गया है कि किस प्रकार एक महिला सरपंच सामाजिक दबावों के बावजूद धीरे-धीरे अपनी पहचान और नेतृत्व स्थापित करती है। अ/ययन का निष्कर्ष यह है कि केवल राजनीतिक आरक्षण पर्याप्त नहीं है वास्तविक सशक्तिकरण के लिए सामाजिक चेतना, प्रशासनिक सहयोग, प्रशिक्षण, शिक्षा और सामुदायिक समर्थन आवश्यक हैं। यदि पंचायत स्तर पर महिलाओं को अनुकूल वातावरण प्रदान किया जाए, तो वे ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी को नई दिशा दे सकती हैं।

शब्दकोशः पंचायतीराज, महिला प्रतिनिधि, पितृसत्तात्मक व्यवस्था, घूँघट प्रथा, प्रधान-पति, सामाजिक रूढ़िवादिता, राजनीतिक सशक्तिकरण।


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