उत्तर आधुनिकता वर्तमान समाज की एक जटिल और बहुआयामी अवधारणा है। आधुनिकता के तर्क, विज्ञान और प्रगति के आदर्शों के विपरीत, उत्तर आधुनिकता विविधता, बहुलता, विखंडन और सापेक्षता पर बल देती है। इस परिवर्तन ने जहाँ एक ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति के नए आयाम खोले हैं, वहीं दूसरी ओर सांस्कृतिक अस्थिरता, सांस्कृतिक मूल्यों के विघटन जैसी समस्याओं को भी जन्म दिया है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और तकनीकी विकास ने समाज के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है, वहाँ सांस्कृतिक संरचनाएँ भी परिवर्तन के दौर से गुजर रही हैं। पारंपरिक मान्यताएँ, रीति-रिवाज, नैतिक मूल्य और सामाजिक संस्थाएँ पहले जैसी स्थिर नहीं रह गई हैं। इसके स्थान पर एक ऐसी संस्कृति विकसित हो रही है जो उपभोग-केंद्रित और मीडिया-प्रभावित है। तकनीकी मा/यमों और सोशल मीडिया के विस्तार ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया है, साथ ही साथ सांस्कृतिक समानता और स्थानीय पहचान के विघटन की समस्या को भी उत्पन्न किया है। इस परिप्रेक्ष्य में सांस्कृतिक संकट केवल सांस्कृतिक मूल्यों के ह्रास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संबंधों, नैतिकता, सामूहिक चेतना और सामाजिक एकता को भी प्रभावित करता है। अतः यह अ/ययन उत्तर आधुनिकता के इस जटिल प्रभाव को समझने तथा बदलते समाज में उत्पन्न सांस्कृतिक चुनौतियों का विश्लेषण करने का एक प्रयास है।
शब्दकोशः आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता, सांस्कृतिक मूल्य, वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद।
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Article DOI: 10.62823/IJEMMASSS/8.2(I).8860