मुग़लकालीन इतिहास में महिलाओं की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक भागीदारी के अध्ययन में ‘नूरजहाँ जुंटा’ की अवधारणा एक अत्यंत विवादास्पद और केंद्रीय विषय रही है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य 20वीं सदी के पारंपरिक इतिहास-लेखन द्वारा स्थापित इस ‘जुंटा सिद्धांत’ का सर्वांगीण और आलोचनात्मक मूल्यांकन करना है। यह शोध डॉ. बेनी प्रसाद की मूल परिकल्पना और प्रो. एम. नूरुल हसन द्वारा किए गए इसके संस्थागत खंडन का गहन विश्लेषण करता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि नूरजहाँ के सत्ता-काल में पदों और मनसबों की वृद्धि एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी, न कि किसी साज़िश या गुटबाज़ी का परिणाम। यह अध्ययन निष्कर्ष निकालता है कि मुग़ल सत्ता में एक संप्रभु महिला की प्रत्यक्ष भागीदारी को समझने में तत्कालीन और परवर्ती इतिहासकारों के पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों ने एक ‘प्रशासनिक यथार्थ’ को ‘महल की साज़िश’ में तब्दील कर दिया।