ISO 9001:2015

कालिदास के काव्यों में नदियों का पर्यावरणीय चित्रण

डॉ. मिथिलेश कुमार

महाकवि कालिदास ने अपने काव्यों में प्रकृति के विविध रूपों का अद्वितीय चित्रण किया है, जिनमें नदियों का विशेष स्थान है। उनके काव्य में नदियाँ केवल जलधारा मात्र नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक एवं भावनात्मक प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत होती हैं। रघुवंश में गंगा की पवित्रता, महिमा और लोककल्याणकारी स्वरूप का उल्लेख मिलता है। कुमारसंभव  में हिमालय से उद्भूत नदियों का सौंदर्य तथा उनके तटों पर पुष्पित वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की रमणीयता का चित्रण है। मेघदूत में नदियों को प्रिय-प्रियसी के बीच संदेशवाहक मेघ के मार्ग में पड़ने वाले स्थलों के रूप में दर्शाया गया है, जहाँ उनकी कलकल ध्वनि और शीतल जल भावनात्मक वातावरण का सृजन करते हैं। नदियों के प्रवाह को कालिदास ने मानव जीवन के उतार-चढ़ाव से भी जोड़ा है। कहीं नदियों का शांत प्रवाह प्रेम और शांति का प्रतीक है तो कहीं उनका तीव्र वेग उत्साह और पराक्रम का द्योतक है।  इस प्रकार कालिदास ने नदियों को केवल भौगोलिक इकाई न मानकर जीवनदायिनी, प्रेरणास्रोत और भारतीय संस्कृति की संवाहिका के रूप में चित्रित किया है। उनके काव्यों में नदियाँ मानवीय संवेदनाओं, धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम प्रतीत होती हैं।

शब्दकोशः प्राकृतिक सुषमा, लौहित्य, मन्दाकिनी, भोटियाकोसी, तम्बकोसी, लिखुकोसी, दूधकोसी, मालविकाग्निमित्र।


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