ISO 9001:2015

सीकर जिले में कृषि उत्पादकता का भौगोलिक (स्थान-कालिक) विश्लेषण

पंकज एवं डॉ. एच.एन. कोली (Pankaj & Dr. H.N. Koli)

कृषि उत्पादकता खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास की नींव है, विशेषकर अर्थ-शुष्क क्षेत्रों जैसे राजस्थान के सीकर जिले में। प्रस्तुत अध्ययन में वर्ष 2011-12 से 2021-22 तक की अवधि के दौरान खाद्यान्न, दलहन और तिलहन फसलों की उत्पादकता में आए स्थानिक-कालिक परिवर्तनों का विश्लेषण किया गया है। यह परीक्षण जिला स्तरीय ऑकड़ों (किलोग्राम हेक्टेयर) पर आधारित है, जो उत्पादन प्रवृतियों को स्पष्ट करता है। अध्ययन के अनुसार खाद्यान्न कसों की उत्पादकता 2011-12 में 1665 कियाhttps://updes.up.nic.in/ हेक्टेयर से बढ़कर 2021-22 में 1935  हैक्टेयर हो गई, जिसमें सिंघाई सुविधाओं के विस्तार और तकनीकी उन्नति का बड़ा योगदान रहा। इसी तरह दलहनों में मध्यम वृद्धि दर्ज हुई, जो 797 किग्रा हेक्टेयर से बढ़कर 803 किhttps://updes.up.nic.in/हेक्टेयर हो गई। वहीं तिलहन उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जो 1090  हैक्टेयर से बढ़कर 1495 हेक्टेयर तक पहुँची। इसका प्रमुख कारण उन्नत कृषि तकनीकों का प्रयोग और तिलहन उत्पादन को प्रोत्साहित करने वाली सरकारी योजनाएँ रही हैं। इस अध्ययन में समय-श्रृंखला विश्लेषण (ज्पउम-ैमतपमे ।दंसलेपे) का प्रयोग कर उत्पादकता में हुए परिवर्तनों का मूल्यांकन किया गया तथा उन कारको की पहचान की गई जो इन भिन्नताओं के लिए उत्तरदायी रहे। निष्कर्ष बताते हैं कि खाद्यान्न और तिलहन फसलों की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ, जबकि दलहनों की वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही। वर्षा की अनिश्चितता, सिंचाई के प्रसार, उच्च उपज देने बाती किस्मों को अपनाने और कृषि तकनीकों में सुधार जैसे तत्व इन प्रवृतियों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक रहे। साथ ही, अध्ययन ने जिले के भीतर स्थानिक भिन्नताओं को भी उजागर किया, जहाँ सिंचाई सुविधाओं से संपन्न तहसीलों में वर्षा-आधारित क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक उत्पादकता वृद्धि दर्ज की गई। इन परिणामों से स्पष्ट है कि सतत कृषि विकास के लिए दलहन उत्पादकता में सुधार तथा तिलहन खेती को और बढ़ावा देने हेतु लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं। इसके लिए जल संरक्षण उपायों का प्रसार, पिसीजन फार्निंग तकनीकों का उपयोग और उल्लत चीज किस्मों का विकास प्रमुख कदम हो सकते हैं, जिससे फसलों की जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता बढ़ सकें। भविष्य के शोध में जीआईएस-आधारित स्थानिक विश्लेषण और रिमोट सेसिंग तकनीकों को शामिल किया जा सकता है. जिससे सीकर जिले के विभिन्न हिस्सों में कृषि उत्पादकता प्रवृतियों का अधिक गहन और समय आकलन संभव हो सके।
शब्दकोशः कृषि उत्पादकता, सिंचाई, समय-श्रृंखला विश्लेषण, जीआईएस, स्थान-कालिक प्रवृतियों, खाद्यान्न फसले, दलहन, तिलहन, राजस्थान, सीकर जिला, फसल उपज, सतत कृषि, स्थानिक असमानताएँ।
 


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