करौली क्षेत्र का धार्मिक पर्यटन एवं यहाँ की वास्तुकला का संबंध यहाँ के सांस्कृतिक परिवेष के साथ घुला मिला है। यहाँ के मन्दिरों एवं डांग क्षेत्र का अपना अलग स्वरूप है। बीहड़ और दस्युओं के प्रभाव ने यहाँ की संस्कृति और वास्तुकला को प्रभावित किया है। फिर भी पर्यटन की असीम सम्भावनाऐं यहाँ विद्धमान है। गढ़मोरा का जल तीर्थ, त्रिकूटवासनी कैलादेवी, चम्बल अभ्यारण, रहस्यमयी किला तिमनगढ़, महावीरजी, मेहन्दीपुर बालाजी, मदनमोहन जी आदि के प्राचीन मन्दिर इसे विशिष्ट बनाते है। शोध का उद्देष्य यह स्पष्ट करना है कि करौली क्षेत्र की वास्तुकला और पर्यटन की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के मा/यम से इस क्षेत्र की उपेक्षित पहचान को एक नवीन दृष्टिकोण मिले।
शब्दकोशः पुरावशेष, परम्परा संरक्षण, बीहड़, डाँग, आमलक, जलतीर्थ, जीरे खां की मजार, कीर्तिमुख, लकेष्वरी, दस्यु, अनार खो।