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स्थानीय स्वशासन और विकास राजनीतिः दौसा जिले में पंचायतों की भूमिका का विश्लेषण

रामबाबू मीना (Rambabu Meena)

यह शोधपत्र दौसा जिले में पंचायती राज संस्थाओं की संरचना, कार्यप्रणाली और विकासात्मक भूमिका का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में स्थानीय स्वशासन की सैद्धांतिक पृष्ठभूमि, भारत में पंचायती राज व्यवस्था का विकास और राजस्थान में इसके ऐतिहासिक व संवैधानिक स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है। दौसा जिले की सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक प्रोफाइल के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि ग्राम स्तर पर जनसंख्या का बड़ा हिस्सा कृषि और ग्रामीण आजीविका पर निर्भर है, और सामाजिक संरचना में जातीय, वर्गीय एवं लैंगिक विविधता पाई जाती है। जिले के लालसोट, सिकराय, महुआ, बसवा और दौसा तहसीलों में पंचायतों का गठन स्थानीय प्रशासन और विकास की प्राथमिकताओं के अनुरूप किया गया है। अध्ययन में नई ग्राम पंचायतों के गठन का विवरण देते हुए उनके कार्यक्षेत्र, अधिकार और जिम्मेदारियों को भी उजागर किया गया है। अध्ययन यह दर्शाता है कि पंचायतें ग्रामीण विकास की धुरी के रूप में कार्य करती हैं, जिसमें आधारभूत संरचना, रोजगार सृजन, स्वच्छता, जल प्रबंधन और सामाजिक कल्याण से जुड़ी योजनाओं का क्रियान्वयन शामिल है। हालांकि, पंचायतों के सामने वित्तीय सीमाएँ, प्रशासनिक नियंत्रण, राजनीतिक गुटबंदी और सामाजिक दबाव जैसी चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। महिला और आरक्षित वर्ग के प्रतिनिधियों की सहभागिता ने स्थानीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाया है, लेकिन निर्णय-निर्माण में उनकी स्वतंत्र भूमिका अभी भी सीमित है। संपूर्ण रूप में यह शोधपत्र यह निष्कर्ष देता है कि यदि पंचायतों को पर्याप्त स्वायत्तता, संसाधन, प्रशिक्षण और पारदर्शिता प्रदान की जाए, तो वे ग्रामीण विकास और लोकतांत्रिक सहभागिता के क्षेत्र में अधिक प्रभावी और समावेशी भूमिका निभा सकती हैं। 

शब्दकोशः पंचायती राज, स्थानीय स्वशासन, ग्राम पंचायत, ग्रामीण विकास, दौसा जिला, राजनीति, गुटबंदी, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल, विकासात्मक भूमिका।


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