साहित्य की किसी विधा के साथ जब ‘लोकप्रिय’ शब्द जुड़ता है,तो उसका सीधा-सीधा संबंध एक व्यापक जनसमुदाय के साथ जुड़ने से होता है। किसी साहित्यकार की विचारधारा व्यापक जन समुदाय के साथ जुड़कर ही समाज में युगों-युगों तक अजर-अमर रहती है। ‘लोकप्रियता’ के इस बिंदु का आधार लोक मानस की अभिरुचियों और इच्छाओं के साथ-साथ समाज की शाश्वत पृष्ठभूमि और उसकी परिवर्तनगामी परिस्थितियों भी होती है ।इस दृष्टि से किसी साहित्य या साहित्यकार की लोकप्रियता को समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से ही परखा और समझा जा सकता है। उत्तरछायावादी कवि, मंचों के बेताज बादशाह, ‘नेपाली’ जी की लोकप्रियता के अनेक महत्वपूर्ण बिंदु रहे हैं, जिन्हें उनके काव्य को पढ़कर और समझकर ज्ञात होता है किकृ उनका काव्य जनमानस के पटल पर अपनी अमिट छाप किसी एक या दो कारण से नहीं, वरन् ऐसे अनेक महत्वपूर्ण बिंदू हैं, जो उनकी काव्य- यात्रा को लोकप्रियता के परचम तक लाने में अपनी अहम् भूमिका निभाते हैं । इस शोध - पत्र में उन महत्वपूर्ण बिंदुओं को खोजने और स्पष्ट करने का एक प्रयास किया गया है। जिसमें उनकी अनुभूति एवं अभिव्यक्ति के अनेक ऐसे गुण हैं, यथा - सरलता, सहजता, भाव प्रवीणता, गेयात्मकता आदि जिनकी उपस्थिति ‘नेपाली’ - काव्य को मानस - पटल पर अमर एवं लोकप्रिय बनाएं हुए है। यहां उन्हीं बिंदुओं को विस्तारपूर्वक उल्लेखित करने का प्रयास किया गया है।
शब्दकोशः लोकप्रियता, गेयात्मकता, कालजयी प्रभाव, बाजारवाद, प्रासंगिकता।